Monday, April 17, 2023

मार डालो मुझे, छील दो ये जिस्म, 

कि बेमतलब है जीना मेरा, 

जब तेरा साथ ना रहा, 

तो क्या रहा होना या ना होना मेरा |


हम कब तक संभाले ये ग़म-ए-दहर, 

ये आंसुओं मे डूबी ज़िंदगी,

कि तेरे बिना तो अब, 

बस एक तमाशा सा है रोना मेरा |


अब हम से ना पूछो, 

कुछ पाने की खुशी, कुछ खोने का ग़म, 

कि तुझे खो कर तो अब, 

एक सा है कुछ पाना या खोना मेरा |


भुला दी जब यादें सब, 

तो भुला देना ये ज़माना मेरा, 

कि जब यादें ना रही,

तो क्या रहा याद आना, या ना आना मेरा |


कुछ ज़हर घोल दो मेरी हवा मे, 

कि हर सांस मे थोड़ा सा मर जाऊं, 

कि जब जी कर कोई फर्क़ ना पड़ा, 

तो क्या फर्क़ लाएगा मर जाना मेरा |


-अभिनव शर्मा "दीप" 

Thursday, October 21, 2021

तसव्वुर में बैठे थे हम उनके, 

वो कब उठ कर चल दिये, पता ही ना चला |


इबादत में मांग रहे थे हम उनको,

वो कब झरोखों से बह गए, पता ही ना चला |


स हकीक़त से हम जूझ रहे थे,

वो कब ख़्वाबों से चले गए, पता ही ना चला |


और इस आग में हम जल रहे थे, 

वो कब चिंगारी सा बुझ गए, पता ही ना चला |


-अभिनव शर्मा "दीप" 


Monday, May 31, 2021

आए जो आज वो फ़िर ख़्वाबों में मिलने, 

तो हमने ख़्वाबों में खुद को मयस्सर कर लिया |


बात उम्र भर साथ रहने की थी,

इक रात को अपना, हमने उम्र भर कर लिया |


हमने सजदों में भी इतना मांगा उन्हें, 

कि मस्जिद को ही अपना घर कर लिया |


शहर में तो उनके आए थे हम बसने, 

पर उनके दर को ही, अपना शहर कर लिया |


आना तो उनका लाज़मी नहीं था मगर, 

इन्तेज़ार उनका हमने सारी उमर कर लिया |


ले कर आए थे हम कयी शिकायतें, 

पर हुनर ने उनके हमें बे-सिपर कर दिया |


अनजानों सा इश्क़ ता-उम्र किया, 

पर उनके नाम को आज मुश्तहर कर दिया |


खो जायेंगे हम भी कभी, शायर की तरह, 

पर नाम के उनको, आब-ए-ख़िज़र कर दिया |


- अभिनव शर्मा "दीप"  


मयस्सर = available

बे-सिपर = unarmed

मुश्तहर = announce

आब-ए-ख़िज़र = lake of immortality



Saturday, March 20, 2021

आशियां

अरे आप कहां रुक गए, 
चलते रहिए, 
आने वाले समय में
अपने आशियां बनाइए |
हमें अभी अपनी दरारें 
कुछ और भरनी है,
बिखरे हुए कल की 
कुछ यादें इकट्ठा करनी हैं |
आखिर यादें ही तो हैं 
जो साथ आयेंगी, 
कल हम जिए भी थे, 
यह ही तो बताएंगी |

कहाँ सोच मे पड़ गए, 
सब ठीक ही तो है,
कल करी जो गलतियाँ, 
सब सीख ही तो है |
इनसे सीख कर ही तो, 
आगे चलते जाएंगे,
आगे शायद एक आशियाँ 
और बनाएंगे |
टूट भी गए अगर 
तो क्या ग़म है, 
जिएंगे फिर से, 
क्यूंकि हमसे ही तो हम हैं |

कहाँ अफसोस जताने लग गए, 
अभी बहुत दूर जाना बाकी है, 
मुश्क़िल ही सही, 
यह सफर अभी निभाना बाकी है, 
कि कब मुश्किलें देख 
हम रुक गए थे, 
कब कभी हम, 
लड़ने से पहले झुक गए थे |
पर आप मत रुकिए, 
हम पहुंच जाएंगे,
रास्ता भटक भी गए अगर, 
पर मंज़िल ज़रूर पाएंगे, 
एक शायद आशियां, 
और बनाएंगे |

- अभिनव शर्मा "दीप" 

Tuesday, November 10, 2020

यह देखो द्वंद छिड़ा है

यह देखो द्वंद छिड़ा है,
कहीं आग सा तपा है,
कभी बाढ़ में बहा है,
कहीं ज्वालामुखी की-
ज्वाला सा,
पनपता ही रहा है,
यह देखो द्वंद छिड़ा है |
कहीं गगन को-
आधार बना,
महलों सा बसा है,
कभी गिर कर यूं टूटा, कि,
खण्डहर भी नहीं रहा है,
तो कभी महलों और 
खण्डहरों के बीच में फंसा है,
यह देखो द्वंद छिड़ा है |
कभी दृश्य देख कर दंग है,
कहीं कर्म कर, कर तंग है,
कभी दर्शक और कर्ता के, 
बीच में पड़ा है,
यह देखो द्वंद छिड़ा है |
कहीं सूर्य की चमक से, 
ज़्यादा भी चमका है,
कभी अंधियारे में,
अंधेरों सा,
भटकता भी रहा है,
तो कभी रात और दिन के,
बीच में खड़ा है, 
यह देखो द्वंद छिड़ा है |
कहीं जीता है,
कहीं हारा है,
पर आज-
हार और जीत का,
फर्क़ भूल चुका है,
यह कैसा द्वंद छिड़ा है |

- अभिनव शर्मा "दीप"