मर कर भी जीते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे,
दिल छोड़ कर भी जीते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।
टुकड़ों को हमने जोड़ के बनाया घर इस तरह,
टूटते हुए घर में रहते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।
जब ख़ुद से ही बातें करने में सुकूँ मिले,
बिन आवाज़ के जीते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।
हर कदम पर सोच कर जो रखना पड़े कदम,
तलवार पे चलते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।
दुनिया को जीत कर भी आ जाए अगर,
पर ख़ुद से रोज़ हारते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।
उनको सलामत रखने की चाहत में हम,
अपनी ही सलामती खोते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।
उनसे निभा के वफ़ा-ए-इश्क़ यूँ,
ख़ुद से ही बेवफ़ा होते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।
- अभिनव शर्मा "दीप"
No comments:
Post a Comment