Sunday, April 26, 2026

आज तुमसे तुम, कुछ भुलाए जाएंगे,

तुमसे, आज, तुम, फिर घटाए जाएंगे।


फ़क़त लम्हों में किया जो तुमने इश्क़,

आज हर वो लम्हे जलाये जाएंगे।


धड़कनों से वाबस्ता जो अरमान थे कभी,

रवाँ थे रगों में-अब सुखाए जाएंगे।


बड़ी दूर तक ले जाना था ये रिश्ता तुमको,

उस डोर के हर तार, अब छुड़ाए जाएंगे।


नाज़ था जो तुम्हें अपनी धड़कनों पर,

वो धड़कनें, अब सर में गूँजाए जाएंगे।


रस्म-ए-उल्फ़त जो तुमने अदा की थी कभी,

उसकी क़ीमत अब, अदावत में चुकाए जाएंगे।


क्या शिकवा करें हम ज़माने से अब,

हम कौन सा इस ज़माने को याद आएंगे।


बड़े नाज़ से जो पाला था, तुमने खुद को,

आज, तुम, तुमसे ही दफ़नाए जाएंगे।


"अभी" नाम था जो कभी, अब मिटाए जाएंगे,

आज, तुमसे, तुम, फिर घटाए जाएंगे।


-अभिनव शर्मा "दीप"


फ़क़त = only

वाबस्ता = connected

रवां = flowing

गूँजाए = reverberate 

रस्म-ए-उल्फ़त = customs of love

अदावत = enmity