Monday, April 27, 2026

मर कर भी जीते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे,
दिल छोड़ कर भी जीते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।

टुकड़ों को हमने जोड़ के बनाया घर इस तरह,
टूटते हुए घर में रहते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।


जब ख़ुद से ही बातें करने में सुकूँ मिले,
बिन आवाज़ के जीते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।

हर कदम पर सोच कर जो रखना पड़े कदम,
तलवार पे चलते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।

दुनिया को जीत कर भी आ जाए अगर,
पर ख़ुद से रोज़ हारते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।

उनको सलामत रखने की चाहत में हम,
अपनी ही सलामती खोते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।

उनसे निभा के वफ़ा-ए-इश्क़ यूँ,
ख़ुद से ही बेवफ़ा होते हैं कैसे — कोई हमसे पूछे।

- अभिनव शर्मा "दीप" 

Sunday, April 26, 2026

आज तुमसे तुम, कुछ भुलाए जाएंगे,

तुमसे, आज, तुम, फिर घटाए जाएंगे।


फ़क़त लम्हों में किया जो तुमने इश्क़,

आज हर वो लम्हे जलाये जाएंगे।


धड़कनों से वाबस्ता जो अरमान थे कभी,

रवाँ थे रगों में-अब सुखाए जाएंगे।


बड़ी दूर तलक ले जाना था ये रिश्ता तुमको,

उस डोर के हर तार, अब छुड़ाए जाएंगे।


नाज़ था जो तुम्हें अपनी धड़कनों पर,

वो धड़कनें, अब सर में गूँजाए जाएंगे।


रस्म-ए-उल्फ़त जो तुमने अदा की थी कभी,

उसकी क़ीमत अब, अदावत में चुकाए जाएंगे।


क्या शिकवा करें हम ज़माने से अब,

हम कौन सा इस ज़माने को याद आएंगे।


बड़े नाज़ से जो पाला था, तुमने खुद को,

आज, तुम, तुमसे ही दफ़नाए जाएंगे।


"अभी" नाम था जो कभी, अब मिटाए जाएंगे,

आज, तुमसे, तुम, फिर घटाए जाएंगे।


-अभिनव शर्मा "दीप"


फ़क़त = only

वाबस्ता = connected

रवां = flowing

गूँजाए = reverberate 

रस्म-ए-उल्फ़त = customs of love

अदावत = enmity