Sunday, May 3, 2020

मौसम

The heat used in this poem is used as a 
metaphor for corruption.
Feel these words from the youth
of the nation, who is tired of this
heat, and wants to end it, even if
it costs him his life.


इतनी गर्मी सह नहीं पा रहे, चलो बारिश ले आते हैं,
इस सूखी धरा को, चलो थोड़ा भिगाते हैं |

कहाँ सोये हैं ईमान के बादल, या फिर ये खो गए,
ढूंढते हैं इनको, चलो इनको जगाते हैं |

गब़न की आग ऐसी लगे, कि सब झुलस जाए,
चलो इस आग को, लगने से पहले बुझाते हैं |

यह डूब रही है दुनिया, चलो इसको बचाते हैं,
गोते खा कर ही सही, आज तैरना सीख जाते हैं |

-अभिनव शर्मा "दीप"

Friday, May 1, 2020

तानाशाही

यह कैसा कोहरा है, क्यूँ  धुआं सा छाया है?
क्या यह देश प्रेम है, या अंधी भक्ति का साया है?

सत्ता के खिलाफ होना, क्या देश द्रोही हो जाना है?
पर कब सत्ता की ग़ुलामी करना, आज़ादी कहलाया है?

राज्य और राष्ट्र का फर्क़ क्या इतना कठिन है?
की राज्य की लड़ाई ने, राष्ट्रीयता को भुलाया है?

देश कहां पहले भी उन्नति की ओर अग्रसर था,
पर आज राजा की भक्ति कर, उसे घुटने पर ले आया है |

विरोध मुक्त राजनीति, कब जनतंत्र का हिस्सा थी,
चुनाव मे जीते राजाओं को, बस तानाशाह बनाया है |

-अभिनव शर्मा "दीप"

Wednesday, April 22, 2020

ज्ञापिका

है जश्न ये कैसा, क्या जीता है?
कौन से दुर्ग पर विजय पायी है?
अभी तो संग्राम चल रहा है,
अभी कहाँ पूरी हुई लड़ाई है |

हो आनंदित, भूल गए तुम,
किस लक्ष्य से द्वंद छेड़ा था,
किस लिए इस दुनिया ने रुख,
समर की ओर मोड़ा था |

विपत्ति ग्रस्त है विश्व आज भी,
कहाँ मिला इसे समाधान है,
झूल रहा है मौत की गोद में,
मांगता तुम्हारा योगदान है |

है नहीं कोई आखेटक यहां,
पर बन गए सब आखेट हैं,
प्रकृति के समक्ष हार रहे,
पर होते नहीं सचेत हैं |

और कितनी जानें जाने पर,
यह बोध हो पाएगा,
कि जुड़ कर नहीं लड़े अगर,
मानुष्य विलुप्त हो जाएगा |

दृढ़ हो कर डटे रहो,
संगरोधित रहना और सहना है,
कठिन इस वक़्त का हम सब ने,
मिल कर संहार करना है |

भटकते हुए इस जग को,
फिर से सहारा मिल जाएगा,
डूबती इस दुनिया की नाव को,
फिर से किनारा मिल जाएगा |

- अभिनव शर्मा "दीप"

Thursday, April 9, 2020

क्या तुमको अकेलेपन का एहसास कराए,
कभी ख़ुद को, ख़ुद से भी अकेला नहीं पाते हम |

सोचते हैं जब, अब किसी की नहीं ज़रुरत,
तो तन्हाई में भी अकेले नहीं रह पाते हम |

मुश्किलें कयी हैं, पर गिनाये तुमको क्या क्या,
उन मुश्किलों का सामना भी तो नहीं कर पाते हम |

कभी अंदर के इंसान को जगाना चाहते हैं,
पर कमबख्त, अंदर भी तो नहीं जा पाते हम |

और इस इश्क़ का भी एहसास, ऐसा कैसा है,
कि इसमे डूबे बिना, जी भी तो नहीं पाते हम |

इस आग के दरिया में कब तैरना मुमकिन था,
पर डूबना भी चाहे, तो साहिल पर आ जाते हम |

बैठ साहिल पर फिर देखते हैं तन्हाई को,
क्योंकि, तन्हाई से भी तो इश्क़ नहीं कर पाते हम |

क्या सुनाए तुमको अपने दर्द की दास्तान,
दर्द को ज़ुबान भी तो नहीं दे पाते हम |

कभी सोचते हैं, कि लिख देंगे आग ईन पन्नों पर,
पर पानी पर अपने नाम की, छलक तक नहीं छोड़ पाते हम |

-अभिनव शर्मा "दीप"

Monday, March 23, 2020

भगत सिंह

कलमों की स्याही सूख जाएगी,
पर उनकी स्तुति लिख नहीं पाएगी |
तेईस की उम्र में जो पा गए शहादत,
उनकी गाथा ये कैसे सुनाएगी?

एक ही जुनून को बचपन से पाला था,
आज़ादी पाने का वो ऐसा मतवाला था,
कि बंदूक को खेत में गाड़, पिता से पूछे,
और बंदूकें कब तक उग पाएगी,
ऐसे बच्चे की कहानी ये कैसे सुनाएगी?

जलियांवाले की मिट्टी को साथ रख के,
ताकि उनकी चीखें कभी भुला ना सके,
9 साल बाद भी बदला लेने की अभिलाषा की,
कहानी कोई स्याही कैसे रंग पाएगी,
ऐसे वीर की कहानी ये कैसे सुनाएगी?

बेहरों को सुन सके ऐसा धमाका करा के,
अपने इरादे पूरी दुनिया को बता के,
खोखले न्यायालय को विश्वा को दिखाया,
ऐसे इंसाफ का सच सामने क्या ला पाएगी?
ऐसे शब्दों का बोझ एक कलम कैसे उठाएगी?

क़ैद में भी अनशन, आंदोलन चला कर के ,
खाना, कपड़े, अखबार, सब ला कर के,
अंग्रेजों की कैद में रह कर, उन पर हुकुम चलाया,
इस बात की गहराई को क्या बयान कर पाएगी?
कलम ये कहानी कागज़ पर कैसे लाएगी?

बन कानूनी गवाह, जब अपनों ने धोखा दिया,
मिली वज़ह हुकूमत को, और दोषी करार किया,
सुना कर फांसी सोचा, अब तो बला टल जाएगी,
उन्हें क्या पता था कि उनकी मौत भी संग्राम लाएगी,
देश के उबाल की गर्मी को कलम कैसे सुनाएगी?

तेईस मार्च को तेईस की उम्र में, दिया वो बलिदान,
शहीद हुए आज़ादी के लिए, जैसे यही था अरमान,
लगा इंकलाब के नारे, रंग दिया बसंती देश,
भगत सिंह की कहानी लिख पाएगी क्या?
शहीदों की ये रवानी कलम सुनाएगी क्या?

-Abhinava Sharma "Deep"